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प्रस्तावना

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जीवन बड़ा ही अजीब खेल है। कभी यह आपके गाल थपथपाता है, तो कभी ऐसा तमाचा जड़ता है कि आप दो मिनट तक गिन ही नहीं पाते कि हुआ क्या। मेरी यह आत्मकथा उसी तमाचों और थपथपाहटों का लेखा-जोखा है। इसमें जीवन की वो मिठास है, जो गुड़ के साथ आती है, और वो कड़वाहट भी है, जो गुड़ के खत्म हो जाने पर रह जाती है। जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों से सजी यह आत्मकथा एक ऐसी दास्तान है, जो न केवल मेरे निजी अनुभवों का पुलिंदा है, बल्कि समाज की विडंबनाओं, रिश्तों की राजनीति, और इंसानी जज्बातों की तमाशेबाजी का भी आईना है। यह पुस्तक उन घटनाओं का संग्रह है, जिन्होंने मेरी मासूमियत को पिसाई मशीन में डालकर ऐसा महीन आटा बना दिया कि अब उसमें पानी मिलाने से भी उम्मीद की रोटियाँ नहीं बनतीं। यह आत्मकथा सिर्फ मेरे जीवन का एक्स-रे नहीं है, बल्कि उस समाज का भी है, जो खुद तो मिर्च-मसाले का स्वाद चखना चाहता है, पर दूसरों की ज़िंदगी को बेस्वाद बनाकर ही खुश होता है। इसमें आप पाएंगे कि कैसे एक समृद्ध परिवार, जो कभी गांव के चौपाल का शेर हुआ करता था, धीरे-धीरे वक्त और हालात के शिकारी कुत्तों के बीच फंसकर भेड़ बना दिया गया। इस पुस्तक क...